अब दुआएं नहीं देते भिखारी अविनाश रावत कुछ दिनों पहले डीएनए में एक खबर पढ़ी जिससे पता चला कि इंदौर को भारत के आठ ऐसे शहरों में शामिल किया गया है जिन्हें भिखारी मुक्त बनाया जाएगा। खबर पढ़ते ही एक अलग तरह की खुशी का अहसास अब तक हो रहा है। दरअसल इस खुशी के पीछे एक बहुत बढ़ी वजह है। बात कुछ दिनों पहले की ही है मैं विजयनगर स्थित शर्मा चौपाटी पर खाने-पीने गया था। वहां दोस्तों के साथ कुछ चटपटा खाकर वापस घर जाने के लिए अपनी बाइक पर आकर बैठा ही था कि एक भिखारिन नजदीक आ गयी बस फिर क्या था मैैं अपनी जाने बचाने में लग गया और वह भीख लेने की भरसक कोशिश में। कुछ देर तक उसने भीख के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए लेकिन उसके बाद भी जब मैंने कुछ भी देने से मना किया ही था कि हालत देखने लायक हो गए। गोद में बच्चा लिए वह भिखारिन जो अब तक मुझे तरह-तरह की दुआंए दे रही थी अचानक उसके सुर बदल गए और वह मुझे पता नहीं क्या क्या उल्टा सीधा बोलने लगी। करीब पांच मिनट में उसने मुझे कुंवारा रहने, नौकरी छूटने, दोस्तों से झगड़ा होने और इसी तरह की दस बीस बद्दुआंए दे डाली। हद तो तब हुई जब उसने मेरी गाड़ी स्टार्ट होते ही ए...
लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मिलाते हैं चर्बी का घोल ईनंबरिंग में छिपा है रहस्य अविनाश रावत . बीते दिनों उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों से जब्त मैगी के सैंपलों की प्रयोगशाला में जांच पर पाया गया कि इस फास्ट फूड में भारी मात्रा में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) और लेड है। लेड की मात्रा 17 पार्ट्स प्रति मिलियन है, जबकि अनुमति महज 0.01 पीपीएम की ही है। मैगी की जांच करने पर उसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट केमिकल (एमएसजी) की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई गई है। जांच नतीजों के बाद भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को लिखित में मैगी का लाइसेंस रद्द करने के लिए कहा है। मैगी के सैंपल की जांच कोलकाता की रेफरल लैबोरेट्री से करवाई गई है और अब एफएसएसएआई देशभर इस बात की पुष्टि करने के लिए देशभर से मैगी के सैंपल मंगवाकर जांच कर रहा है। 2 मिनट में पकने वाली मैगी नूडल सभी वर्ग और उम्र के लोगों की फेवरेट होती है. लेकिन इस फास्ट फूड को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। मैगी में इस जहरीले केमीकल के साथ ही लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए सुअर का मांस भी मिलाया जा रहा है। सालभर पहले करीब...
अविनाश रावत, वरिष्ठ (ब्राह्मण) पत्रकार बॉलीवुड में इन दिनों मूत्रमार्ग से विचारधारा बहाने का नया चलन है। ताज़ा नमूना पेश किया है अनुराग कश्यप ने, जिसकी फिल्में अक्सर दर्शकों को ऐसा महसूस कराती हैं जैसे सिनेमा हॉल में घुसते ही उन्होंने गलती से गटर खोल दिया हो। इस बार उसने कहा—"मैं ब्राह्मणों पर मूतूंगा।" वाह अनुराग। तुम्हारी फिल्मों की तरह ही तुम्हारी ज़ुबान भी अब दर्शकों की सहनशक्ति का इम्तहान ले रही है। पर क्या करें? जब सिनेमा में कहने को कुछ बचा न हो, और दिमाग की हार्ड डिस्क फॉर्मेट हो चुकी हो, तो गाली, अपमान और घृणा ही "सृजनात्मकता" बन जाती है। अनुराग समेत समूचे बॉलीवुड का सच यही है। कभी धर्म को गाली, कभी सेना को नीचा दिखाओ, कभी साधुओं को व्यंग्य का पात्र बनाओ, कभी राम को काल्पनिक बताओ, और फिर गंगा जल से पुरस्कार धोकर कहो—"हम प्रगतिशील हैं।" इनकी प्रगतिशीलता का पैमाना वही है—जो जितना ज्यादा भारतीयता से नफरत करे, उतना बड़ा "सोचने वाला कलाकार" कहलाता है। अब बात करते हैं ब्राह्मणों की, जिन पर ये मूत्र-वाणी चलाते हैं। जब चाणक्य ने अखंड भारत की ...
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