Tuesday, March 29, 2011

हम एक बार फिर कुंवारे हो जायेंगे.... ...!

अभी शादी का पहला ही साल था,
ख़ुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,
खुशियाँ कुछ यूं उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभल रही थी..

सुबह सुबह मैडम का चाय ले कर आना
थोडा शरमाते हुये हमें नींद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हमारे बालों में फिरना,
मुस्कुराते हुये कहना की...

डार्लिंग चाय तो पी लो,
जल्दी से रेडी हो जाओ,
आप को ऑफिस भी है जाना...

घरवाली भगवान का रुप ले कर आयी थी,
दिल और दिमाग पर पूरी तरह छाई थी,
सांस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
इक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था...

५ साल बाद........

सुबह सुबह मैडम का चाय ले कर आना,
टेबल पर रख कर जोर से चिल्लाना,
आज ऑफिस जाओ तो मुन्ना को
स्कूल छोड़ते हुए जाना...

सुनो एक बार फिर वोही आवाज आयी,
क्या बात है अभी तक छोड़ी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर खुद ही संभाल लेना...

ना जाने घरवाली कैसा रुप ले कर आयी थी,
दिल और दिमाग पर काली घटा छाई थी,
सांस भी लेते हैं तो उन्ही का ख़याल होता है,
अब हर समय जेहन में एक ही सवाल होता है...

क्या कभी वो दिन लौट के आएंगे,
हम एक बार फिर कुंवारे हो जायेंगे.... ...!

Thursday, September 16, 2010

मुझे तो आदत है

SONU PANDIT

मुझे तो आदत है आपको याद करने की,
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......

ये दुनिया वाले भी बड़े अजीब होते है
कभी दूर तो कभी क़रीब होते है
दर्द ना बताओ तो हमे कायर कहते है
और दर्द बताओ तो हमे शायर कहते है .......


एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर,

हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर,
मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना,
हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर

मोहब्बत का इरादा अब बदल जाना भी मुश्किल है,
तुझे खोना भी मुश्किल है, तुझे पाना भी मुश्किल है.
जरा सी बात पर आंखें भिगो के बैठ जाते हो,
तुझे अब अपने दिल का हाल बताना भी मुश्किल है,
उदासी तेरे चहरे पे गवारा भी नहीं लेकिन,
तेरी खातिर सितारेतोड़ कर लाना भी मुश्किल है,
यहाँ लोगों ने खुद पे परदे इतने डाल रखे हैं,
किस के दिल में क्या है नज़र आना भी मुश्किल है,
तुझे ज़िन्दगी भर याद रखने की कसम तो नहीं ली,
पर एक पल के लिए तुझे भुलाना भी मुश्किल है

Tuesday, September 14, 2010

चप्पल की तलाश

SONU PANDIT
कब पूरी होगी इनकी 
आरामदायक चप्पल की खोज 

बरसों गुजर गये. हजारों बार लड़कियों  को चप्पलों की दुकान पर सिर्फ इसलिए जाते देखा है कि उन्हें  एक कमफर्टेबल चप्पल चाहिये रोजमर्रा के काम पर जाने के लिए!
हर बार चप्पल खरीदी भी गई किन्तु उन्हें  कभी  कमफर्टेबल वाली को छोड़ बाकी कोई सी ले ली क्योकि  वह कमफर्टेबल वाली मिली ही नहीं! 
अब तक जिस  दुकान  पर गयी थी  वहां दूसरी फेशनेबल वाली दिख गई नीली साड़ी के साथ मैच वाली तो कैसे छोड़ दें? 
कितना ढ़ूँढा था इसे और आज जाकर दिखी 
तो छोड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता !
हर बार कोई ऐसी चप्पल उसे जरुर मिल जाती है जिसे उसने कितना ढूंढा था लेकिन अब जाकर मिली.
सब मिली लेकिन एक आरामदायक चप्पल की शाश्वत खोज जारी है. उसे न मिलना था और न मिली. सोचता हूँ अगर उसे कभी वो चप्पल मिल जाये तो एक दर्जन दिलवा दूँगा. जिन्दगी भर का झंझट हटे.
लड़कियों की   इसी आदत के चलते यदि मैं अपनी बहन और भाभी के साथ बाज़ार जाता हू तो वहां चप्पल की दुकान दिखते ही मेरी हृदय की गति बढ़ जाती है. कोशिश करता हूँ कि दोनों को किसी और बात में फांसे दुकान से आगे निकल जायें और उसे वो दिखाई न दे. लेकिन चप्पल की दुकान तो चप्पल की दुकान न है, हलवाई की दुकान हो गई कि तलते पकवान अपने आप आपको मंत्रमुग्ध सा खींच लेते हैं. कितना भी बात में लगाये रहो मगर चप्पल की दुकान मिस नहीं होती.
ऐसी ही किसी चप्पल दुकान यात्रा के दौरान, जब वो दोनों  कम्फर्टेबल चप्पल की तलाश में थीं, तो एकाएक उनकी नजर कांच जड़ित ऊँची एड़ी, एड़ी तो क्या कहें- डंडी कहना ही उचित होगा, पर पड़ गई.
अरे, यही तो मैं खोज रही थी. वो सफेद सूट के लिए इतने दिनों से खोज रही थी, आज जाकर मिली.
मैने अपनी भरसक समझ से उनको समझाने की कोशिश की कि यह चप्पल पहन कर तो चार कदम भी न चल पाओगी.
बस, कहना काफी था और ऐसी झटकार मिली कि मैं तब से चुप ही हूँ आज तक.
बहन और भाभी मुझे तत्काल बोली 
’ सोनू भैया आप तो कुछ समझते ही नहीं. यह चप्पल चलने वाली नहीं हैं. यह पार्टी में पहनने के लिए हैं उस सफेद सूट के साथ. एकदम मैचिंग.
तब मैंने पहली बार जाना कि चलने वाली चप्पल के अलावा भी पार्टी में पहनने वाली चप्पल अलग से आती है.

हमारे पास तो टोटल दो जोड़ी जूते हैं. एक पुराना वाला रोज पहनने का और एक थोड़ा नया, पार्टी में पहनने का. जब पुराना फट जायेगा तो ये थोड़ा नया वाला उसकी जगह ले लेगा और पार्टी के लिए फिर नया आयेगा. बस, इतनी सी जूतों दुनिया से परिचय है.
यही हालात उन दोनों के पर्सों के साथ है. सामान रखने वाला अलग और पार्टी वाले मैचिंग के अलग. उसमें सामान नहीं रखा जाता, बस हाथ में पकड़ा जाता है मैचिंग बैठा कर.
सामान वाले दो पर्स और पार्टी में जाने के लिए मैचिंग वाले बीस.
मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इनको क्या पहले खरीदना चाहिये-पार्टी ड्रेस फिर मैचिंग चप्पल और फिर पर्स या चप्पल, फिर मैचिंग ड्रेस फिर पर्स या या...लेकिन आजतक एक चप्पल को दो ड्रेस के साथ मैच होते नहीं देखा और नही पर्स को.
गनीमत है कि फैशन अभी वो नहीं आया है जब पार्टी के लिए मैचिंग वाला हसबैण्ड अलग से हो.
तब तो हम घर में बरतन मांजते ही नजर आते.
घर वाला एक आरामदायक हसबैण्ड और पार्टी वाले मैचिंग के बीस.
गम भरे प्यालों में,
दिखती है उसी की बन्दगी,

मौत ऐसी मिल सके
जैसी कि उसकी जिन्दगी.

बस एक तमन्ना


SONU PANDIT

 अगले जनम मोहे कुत्ता कीजो 

कुत्ता पूरी पृथ्वी का प्रिय जानवर है , हर घर में एक पिल्ला जो देशी या विदेशी कैसा भी हो , पतली  चेन से बंधा मिल जाता है , दरवाजे के बाहर लिखा मिल जाता है , कुत्तों से सावधान !!! अब , उनसे पूछो , कौन से कुत्ते से क्योंकि जो वफादार है ,वह तो काटेगा नहीं , सिर्फ भौंक कर हमें आगाह करेगा , लेकिन दूसरा अदृश्य कुत्ता बिना भौंके उधेड़ डालेगा . सड़कों पर , गलियों में , पार्कों में कहीं पर भी देख लो , इन कुत्तों के साथ एक आदमी बंधा हुआ घूमता मिल जायेगा ! मुझे कुत्तों से कोई दुश्मनी नहीं है , न ही कभी , उनसे आँखें तरेरी हैं , बल्कि लाड -प्यार जो नि: शब्द हो , निशभाव  हो ,मुझे नहीं भाता. जानवर का क्या भरोसा , अभी पूँछ  हिला कर स्वागत कर रहा है , कब टांग में दांत गडा दे , कहा नहीं जा सकता . यह तो , हमारे भय और संदेह कि बात थी , कुत्तों की महिमा अगर सुननी है ; तो  ऐसे घर में चले जाओ , जिसकी मालकिन कुत्ता संभालती हो . बस , कुत्ता कांड शुरू होकर उसके अध्याय चालू हो जाते हैं , आप जिस उद्देश्य को लेकर घर में घुसे हो , वह तो बाहर ही नदारत हो जाता है . आप भागने की जुगत लड़ाने लगेंगे . पहले तो घर में घुसना ही मुश्किल हुआ था , अब , भौंकने की आवाज से ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं . वो तो , भला हो साहब का आते ही बोल दिया अरे !! डरो मत , काटेगा नहीं , बस डराता है .अब , इन्हें कौन बताये कि अगर पहचानता तो आफत ही कर देता . 

कभी  -कभी में असहज हो उठता  हूँ ,
अपने बच्चों का पालन धाय ( आया )  के हाथों करने वाली औरतें , बच्चे को गोद में  भी नहीं लेती और न ही उन्हें एक माँ की तरह दूध पिलाती है क्योंकि फिगर के ख़राब होने का भय रहता है . 
लेकिन कुत्ता गोद में लेकर , उसे खाना खिलाती हैं , उसकी छीछी , फूटू सब दौड़कर साफ़ करतीं हैं , जानवर ही उन्हें समझता है , प्यार करता है !
जब , घर के बुजुर्ग खाना ,पानी , दवा मांगते हैं , तब  उन्हें सुनाई भी नहीं देता है . उन्हे गलियां दी जातीं हैं , उनके शीघ्र विदाई की कामना की जाती है .पर , कुत्ते को हंसते  हुए गोद में बिठाकर लाड का पिटारा खोल दिया जाता है . 
कुत्ता  घंटों उनसे चिपका बैठा रहता है , उन्हे सुरक्षा का अहसास होता है , लेकिन मुश्किल में पड़े बुजुर्ग की लाचारी उन्हें नहीं दिखाई देती . संबेदनाओं की जरूरत किसी और को भी है . धीरे -धीरे कुत्ता उनके बिस्तर में भी घुसने लगा है , उसके बालों की परवाह नहीं है , न ही पिस्सुओं की . जब ,कोई मेहमान पूँछ लेता है , तब खुश होकर बोला जाता है , बड़ा दुष्ट है मेरे साथ ही सोता है . मुझसे बहुत प्यार है . दवा , खाना , घूमने तक कुत्ते जी के खर्चे शाही ही होते हैं . उस पर भी साहब के नखरे कि खाना गरम नहीं है . कुत्ते की महिमा अपरम्पार है .
मुझे तो लगता है की पुनर्जन्म होता ही है , कोई भी प्राणी , किसी भी योनी में आकर अपनी सेवा करा सकता है . लगता है उस व्यक्ति के कान पर जाकर चीखूं तुम इसी योग्य हो . अब , भोगो सजा . और एक दिन उसी कुत्ते की रस्सी में उलझकर आप धराशाही  भी हो सकते हैं . फिर आजीवन उपहार में मिली पीडा , दर्द , आह ,उन्ह , आउच के साथ उन कुत्ते महाशय को याद करते रहो . तो साथियो अब आप ही बताओ 
कौन कुत्ता नहीं चाहेगा की -
अगले जनम उसे कुत्ता ही बना दो ,

Sunday, June 13, 2010

फुटबॉल पर ज्यादा सट्टा, मानसून पर कम


danik bhaskarफुटबॉल पर ज्यादा सट्टा, मानसून पर कम

Avinash Rawat
First Published 12:00[IST](11/06/2010)
Last Updated 1:10 PM [IST](11/06/2010)

इंदौर. वर्ल्डकप फुटबॉल और मानसून के आने का समय लगभग एक है। सट्टा बाजार से जुड़े जानकार कहते हैं सट्टा फुटबॉल पर ज्यादा, मानसून पर कम लग रहा है। ऐसा क्यों, पूछने पर वह बताते हैं ‘मानसून तो हर साल आता है।’ इस बार मुंबई में पुलिस के सक्रिय होने से वहां के सटोरिए अन्य शहरों से अपना नेटवर्क चला रहे हैं।पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज सटोरियों पर नजर रखी जा रही है, साथ ही उनके कॉल डिटेल और कॉल रिकॉर्ड भी चेक किए जा रहे हैं। इसलिए वर्ल्डकप में बुकिंग के लिए नए लोगों का नेटवर्क बनाया गया है जो पुलिस की नजर में न हो। इतना ही नहीं, एहतियात के तौर पर लेन-देन का काम राजस्थान से किया जा रहा है। इंदौर के एक सटोरिए ने बताया-आईपीएल के दौरान जो लोग पकड़े गए थे उन पर क्राइम ब्रांच की नजर है और कुछ लोगों की कॉल डिटेल भी ली जा रही है।



ब्राजील 3.90 (सौ रुपए लगाएंगे तो 490 रु. मिलेंगे)



स्पेन 3.70 (सौ रुपए लगाएंगे तो 470 रुपए मिलेंगे)



अर्जेटीना 5.20( सौ रुपए लगाने पर 620 मिलेंगे)



इंग्लैंड 5.90 ( सौ रुपए लगाने पर 690 मिलेंगे)



इटली 9 ( सौ रुपए लगाने पर एक हजार मिलेंगे)



फ्रांस 9 ( सौ रुपए लगाने पर एक हजार मिलेंगे)



दक्षिण अफ्रीका 11 (सौ रुपए लगाने पर 12 सौ मिलेंगे)



पुर्तगाल 11 (सौ रुपए लगाने पर 12 सौ मिलेंगे)



सभी आंकड़े सट्टा बाजार के मुताबिक



ऐसे-ऐसे दांव :



मैच के दोनों हाफ पर अलग-अलग सट्टा भी लगेगा। पहले हाफ में कितने गोल दागे जाएंगे, इस तरह के दावे भी किए जाएंगे। जीत और मैच में कुल गोल पर भी बाजी लगेगी। एक सट्टेबाज के अनुसार ब्राजील, स्पेन, पुर्तगाल, अर्जेटीना और इटली पर सबसे ज्यादा पैसा लगाया जा रहा है। फ्रांस के कुछ खिलाड़ियों पर भी सट्टा लग रहा है।



तुम दांव लगाओ, बाकी मैं संभाल लूंगा



रिपोर्टर और सट्टा एजेंट शिशुपाल के बीच हुई बात



रिपोर्टर : फुटबॉल वर्ल्डकप के मैच पर दांव कैसै लगता है?



एजेंट : किस टीम पर लगाओगे और कितना?



रिपोर्टर : क्या रेट है और मैच देखने के लिए क्या व्यवस्था है?



एजेंट : रेट तो हर टीम का अलग है और हमारा कंट्रोल रुम फिलहाल राजेंद्रनगर में है।



रिपोर्टर : क्या मैं वहां आ सकता हूं?



एजेंट : दांव लगाओ फिर देखते हैं।



रिपोर्टर: अगर उन लोगों को मेरे बारे में पता चल गया तो?



एजेंट : मै संभाल लूंगा।



रिपोर्टर : लेन-देन के बारे में किसी को पता चला तो?



एजेंट : बता दो मेरा नाम भी बता देना, पुलिस वाले पकड़ भी लेंगे तो साबित कैसे करेंगे।



अफ्रीका व पुर्तगाल के सबसे ज्यादा रेट



राजेंद्रनगर के मकान में बना है कंट्रोल रूम, वर्ल्डकप के हर गोल पर सट्टा लगाने की तैयारी शुक्रवार से शुरू हो रहे फुटबॉल वर्ल्डकप में इंदौर से लगने वाले सट्टे में सबसे ज्यादा रेट दक्षिण अफ्रीका और पुर्तगाल की जीत पर दिया जा रहा है, जबकि ब्राजील की जीत पर अब तक सबसे ज्यादा पैसा लगाया गया है।दक्षिण अफ्रीका या पुर्तगाल की जीत पर सौ रुपए लगाने वाले पर 12 सौ रुपए मिलेंगे, जबकि ब्राजील टीम पर सौ रुपए लगाने पर उसकी जीत पर 490 रुपए मिलेंगे। डीबी स्टार ने सटोरियों के बीच पहुंचकर फुटबॉल वर्ल्डकप में लगने वाले सट्टे के माहौल को जानने की कोशिश की तो पता चला इंदौर में राजेंद्रनगर में एक मकान में इस सट्टे का कंट्रोल रूम बनाया गया है। इसके अलावा महू में भी एक कंट्रोल रूम बना है। दोनों कंट्रोल रूम मैच के दौरान आपस में संपर्क में रहेंगे।



अभी वर्ल्डकप का बिगुल बजा भी नहीं कि सिर्फ इंदौर और महू से ही ब्राजील की फुटबॉल टीम पर करीब दस करोड़ रुपए का सट्टा लग चुका है। यह तो सिर्फ शुरुआत है जैसे-जैसे मैचे खेले जाएंगे हर गोल पर सट्टा लगाने की तैयारी है। सट्टे का यह कारोबार इंदौर के साथ महू से भी किया जा रहा है। इसके पीछे खास वजह है कि वहां फुटबॉल प्रेमी ज्यादा हैं इसलिए महू में भी एक कंट्रोल रूम बनाया गया है। सट्टे की बुकिंग महू में ही की जा रही है, इंदौर में तो सिर्फ एजेंट काम कर रहे हैं। हालांकि उद्घाटन मैच में फिलहाल इंदौर से कम पैसा दांव पर लगा है, लेकिन महू में पहले मैच से ही टीमों की हार-जीत पर दांव लगना शुरू हो गया है।



पहचान होने पर ही लगती है बाजी



पुलिस से बचने के लिए सटोरिए सिर्फ अपनी जान-पहचान और नियमित सट्टा लगाने वालों से ही दांव लगाते हैं। सट्टे की हकीकत जानने के लिए हमारे रिपोर्टर ने जब मैच में सट्टा लगाने की बात कही तो उससे पहले पहचान पूछी गई। रिपोर्टर ने सटोरिए के परिचित का रिश्तेदार बनकर बात की।



दस हजार लगाओ तो ज्यादा फायदे में रहोगे



रिपोर्टर और सटोरिए के बीच हुई बात के अंश :-



रिपोर्टर: फुटबॉल में सट्टा कैसे लगेगा।



सटोरिया: क्यों लगाना चाहते हो।



रिपोर्टर: हां लेकिन जानकारी भी चाहता हूं।



सटोरिया : कभी फुटबॉल में सट्टा लगाया है।



रिपोर्टर : नहीं, लेकिन क्रिकेट में लगाया है।



सटोरिया : यह बिलकुल अलग है और क्या जानते हो फुटबॉल के बारे में।



रिपोर्टर: ज्यादा तो नहीं जानता लेकिन टीमों की स्थिति पता है।



सटोरिया : किस टीम पर लगाना चाहते हो।



रिपोर्टर: आप बताओ जिसके जीतने की उम्मीद ज्यादा हो उसी पर लगाऊंगा।



सटोरिया : मेरे विश्वास पर लगा दोगे और बाद में हार गए तो



रिपोर्टर: ऐसा नहीं है थोड़ी- बहुत जानकारी तो है।



सटोरिया : कितना पैसा है।



रिपोर्टर : अभी तो 10 हजार ही लगाना है, ब्राजील पर कितना मिलेगा।



सटोरिया : ब्राजील पर तो 3.90 का रेट चल रहा है।



रिपोर्टर: मुझे कितना मिलेगा।



सटोरिया : 10 हजार लगा रहे हो तो ज्यादा फायदा तो होगा ही।



रिपोर्टर : बीच में किसी मैच में पैसा लगाना हो तब।



सटोरिया : ठीक है अभी तो पैसै जमा करा दो और बीच में किसी मैच में टीम पर पैसा लगाना हो तो बताना।



80 में लगाओ 85 में खाओ



सटोरियों ने अपनी अलग ही भाषा बनाई है। इस भाषा में सट्टा लगाने पर कहा जाता है 80 में लगाओ या 85 में खाओ। 80 में लगाने का मतलब हुआ किसी टीम की जीत पर दस हजार रुपए लगाने से टीम के जीतने के बाद आठ हजार का फायदा और हार जाने पर दस हजार का घाटा। 85 में खाओ से मतलब है किसी भी टीम की हार पर पैसा लगाना। जिस टीम की हार पर पैसा लगाया है मैच में उसकी हार हो जाने पर दस हजार पर साढ़े आठ हजार का फायदा और जीतने पर दस हजार का नुकसान।



सटोरियों के खिलाफ पूरी प्लानिंग से



काम कर रहे हैं



फुटबॉल वर्ल्ड कप में सट्टे की जानकारी हमें भी मिली है। हमारा सूचनातंत्र इसका पता लगाने के लिए काम कर रहा है, लेकिन उसे पकड़ने की रणनीति के बारे में फिलहाल कुछ बता नहीं सकते। आईपीएल के दौरान भी हमने कुछ लोगों को रंगे हाथों पकड़ा था। इस बार भी हम सटोरियों की धरपकड़ के लिए अपनी नीति पर काम कर रहे हैं। सटोरिए अपना अड्डा हमेशा बदलते रहते हैं इसलिए उन्हें पकड़ना थोडा़ मुश्किल होता है लेकिन हम इसके लिए पूरी प्लानिंग के साथ काम कर रहे है। - अरविंद तिवारी/एडीशनल एसपी, क्राइम ब्रांच



क्रिकेट के हो गए फुटबॉल मैदान



हमारे शहर में 15 साल पहले तक युवाओं में फुटबॉल को लेकर जबर्दस्त क्रेज रहता था। इंदौर में इस खेल की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां 32 फुटबॉल क्लब हुआ करते थे, जहां से राष्ट्रीय स्तर के कई बेहतर खिलाड़ी भी निकले हैं। हालांकि अब इन मैदानों पर फुटबॉल की जगह गेंद और बल्ले दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं, कई फुटबॉल क्लबों का तो अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।



एग्रीकल्चर कॉलेज मैदान



आठ साल पहले तक एग्रीकल्चर कॉलेज के पीछे लगभग 14 एकड़ खाली मैदान पर आदिवासी फुटबॉल क्लब संचालित होता था। 2001-02 में कॉलेज ने अपनी इस जमीन पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, दिल्ली से क्रॉपिंग प्रोग्राम का प्रोजेक्ट लेकर यहां शुरू किया। अब यह मैदान खेत में तब्दील हो चुका है।



खालसा कॉलेज मैदान



यहां राजमोहल्ला फुटबॉल क्लब के खिलाड़ी प्रैक्टिस करते हैं। क्रिकेट की लोकप्रियता के कारण फुटबॉल खिलाड़ियों की संख्या में घटी है। तीन सालों से कोई फुटबॉल टूर्नामेंट भी नहीं हुआ।



चिमनबाग मैदान



स्कूल शिक्षा विभाग के कार्यालय से सटे इस मैदान पर जिला स्तरीय और राज्य स्तरीय टूर्नामेंट होते हैं। इस मैदान का कई बार दुरुपयोग भी हुआ है। सिंहस्थ के दौरान बसों की पार्किग हुई थी।



संयोगितागंज हा.से. स्कूल



रमन वर्मा, पंकज रावरे और नितेश सोनकर जैसे राष्ट्रीय खिलाड़ी इसी मैदान की देन है। हालांकि अब फुटबॉल का अस्तित्व पूरी तरह से मिट चुका है। पिछले पांच सालों से इस मैदान पर नाइट क्रिकेट टूर्नामेंट हो रहे हैं।

http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-satta-market-over-football-world-cup-1049552.html

भोपाल गैस कांडः जांबाज मांग रहा न्याय

danik bhaskarभोपाल गैस कांडः जांबाज मांग रहा न्याय

अविनाश रावत
First Published 11:00[IST](13/06/2010)
Last Updated 12:19 PM [IST](13/06/2010)
इंदौर. उस भयावह मंजर को याद करते हुए रामसिंह बताते हैं शरीर को कंपा देने वाली उस सर्द रात को मैं अपने चार-पांच जवानों और ड्राइवर अर्जुन सिंह के साथ यूनियन कार्बाइड के पास ही बसे रासली गांव से रात्रिगश्त कर लौट रहा था। हमारी गाड़ी ने फैक्ट्री के पास रेलवे क्रॉसिंग पार किया ही था कि चीखते-तड़पते लोग दिखाई दिए।

मैं माजरा समझने के लिए गाड़ी से उतरा ही था कि कुछ महिलाओं ने अपने बच्चों को गाड़ी में डाल दिया और अस्पताल ले जाने की गुहार लगाई। जब तक मैं स्थिति को समझता मेरी भी आंखों और सीने में जलन होने लगी। फिर कुछ लोगों ने बताया कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकल रही गैस के कारण ऐसा हो रहा है। मैंने अपने आप को संभाला और दर्द से कराहते बच्चों और अन्य लोगों को सीधे अस्पताल ले गया।

इसी दौरान जैसे-तैसे तत्कालीन एस.पी. स्वराज पुरी को इस घटना की सूचना दी और मौके पर मदद भेजने को कहा। लोगों को अस्पताल छोड़ने के बाद मैं दोबारा उस जगह गया और वहां का नजारा देख मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। सड़कों पर लाशों के ढेर लग चुके थे। घटनास्थल पर कुछ जानवर भी बंधे हुए थे, जो तड़प रहे थे। उन्हें खोलने को कोशिश भी की, लेकिन तब तक वे दम तोड़ चुके थे। सारी रात ड्राइवर अजरुन और मैं लोगों को अस्पताल पहुंचाने में लगे रहे। जहरीली गैस का प्रभाव इतना था कि लोगों का बच पाना मुश्किल था। अगली सुबह मैंने मृत लोगों का पंचनामा बनाना शुरू किया। गैस कांड के कारण मुझे चार-पांच दिन तक बिना रुके और बिना थके ड्यूटी करना पड़ी। न तो खाने का होश था और न ही नींद का। मैंने बिना किसी स्वार्थ के ईमानदारी से अपना फर्ज निभाया, लेकिन सरकार ने मेरी सेवा का कभी सम्मान नहीं किया।

सालों से लगा रहे गुहार

अपनी परवाह किए बगैर लोगों की जान बचाने वाले चाहत रामसिंह अब तक पुलिस महकमे के कई अफसरों से राष्ट्रपति पदक दिलाने की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई।

लोगों की जानें बचाने के एवज में रामसिंह ने..तकलीफों को गले लगाया

तमाम दु:ख और तकलीफ सहने वाले 80 बरस के इस शेर को अपने महकमे के इस बेरुखे रवैये की उम्मीद नहीं थी। अपना हक पाने के लिए उन्होंने अफसरों से गुहार लगाई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। चाहत रामसिंह आज भी यही आस लगाए बैठे हैं कि एक न एक दिन उनकी सेवा का सम्मान जरूर मिलेगा।

सालों बाद इस त्रासदी का मामला सामने आने के बाद 1990 में डीएसपी के पद से रिटायर हुए चाहत रामसिंह के जख्म भी हरे हो गए। उन्होंने नि:स्वार्थ भाव से लोगों की जान बचाने का काम किया, जिसका खामियाजा बीमारियों के रूप में वे आज तक भुगत रहे हैं। इसके बावजूद उनका नाम राष्ट्रपति पदक के लिए नहीं भेजा गया। रामसिंह और ड्राइवर अजरुनसिंह दोनों ने अपनी जान दांव पर डालकर लोगों को बचाया, लेकिन उन्हें उनका हक नहीं मिल सका। रामसिंह बताते हैं कि उनके बजाय कुछ ऐसे लोगों के नाम राष्ट्रपति पदक के लिए भेज दिए गए, जो इस दिल दहला देने वाली घटना के समय अपना फर्ज छोड़कर खुद की जान बचाने के लिए गए थे। हालांकि ऐसे लोगों का नाम वे सिर्फ इसलिए सामने नहीं लाना चाहते क्योंकि उनमें से कई लोग अब इस दुनिया में नही रहे।

मूलत: जबलपुर के रहने वाले रामसिंह इंदौर में बस गए हैं। पिछले डेढ़ साल से वे मानसरोवर नगर में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। उनकी देशभक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण यही देखने को मिलता है कि बेटे को भी उन्होंने पुलिस विभाग में भर्ती करवाया है। उनका बेटा सीआईडी में इंस्पेक्टर है। हालांकि रामसिंह खुद भी गैस की वजह से कई बीमारियों से पीड़ित हैं। गैस की चपेट में आने के कारण उन्हें आज भी सांस लेने में तकलीफ होती है इसलिए उन्हें अस्थलीन चौबीसों घंटे अपने साथ रखना पड़ती है। इसके अलावा उन्हें आंखों व सीने में जलन होने के साथ-साथ कम सुनाई देता है।

आंखों की तकलीफ के चलते तीन साल पहले उनका ऑपरेशन भी हो चुका है। सालभर पहले उनका पैर का ऑपरेशन कर स्टील की रॉड भी डाली गई। इतनी तकलीफ झेलने के बावजूद सरकार ने उन्हें उपेक्षित ही रखा। आज भी उनके मन में यही आस है कि इस काम के बदले राष्ट्रपति पदक मिले। पदक के लिए अपना और ड्राइवर अजरुन का नाम नहीं पहुंचने के बाद रामसिंह ने पुलिस महकमे के आला अफसरों को कई आवेदन दिए, जिसके बाद हुई जांच में भी निकला कि सम्मान के असली हकदार रामसिंह हैं। जांच करने वाले अफसरों ने उनके नाम की सिफारिश भी की, लेकिन मामला वहीं का वहीं दब गया।
http://www.bhaskar.com/article/NAT-bhopal-gas-tragedy-1055387.html

Saturday, June 12, 2010

News Link of avinash rawat




भोपाल गैस कांड बस एक चाहत

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/13062010/12ids-pg1-0.pdf
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/13062010/12ids-pg2-0.pdf

फुटबॉल पर ज्यादा सट्टा, मानसून पर कम

http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-satta-market-over-football-world-cup-1049552.html


अपना घर छोड़कर ढूंढ़ रहे किराए का मकान

http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-rain-water-creating-trouble-for-denizens-in-indore-1049565.html


हजारों के साथ
बीमा ठगी
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/05062010/4ids-pg1-0.pdf
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/05062010/4ids-pg3-0.pdf

25 हज़ार में हाईकोर्ट में नौकरी

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/03062010/2ids-pg3-0.pdf

करोड़ का कबाड़ा

http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-testing-mobile-machine-kits-are-turning-into-junk-1001018.html

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/25052010/24ids-pg1-0.pdf

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/25052010/24ids-pg2-0.pdf

ट्रस्टी ने बंद किया मंदिर

http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-trust-has-closed-shani-mandir-of-indore-1000566.html

फिल्टर स्टेशन बना पिकनिक स्पोट

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/20052010/19ids-pg3-0.pdf

डिग्री चाहिए तो कमीशन दो

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/21052010/20ids-pg3-0.pdf

सैर पैर शुल्क

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/23052010/22ids-pg3-0.pdf

420 लाख के कर चोर

http://www.bhaskar.com/article/MP-IND-tax-evasion-in-indore-worth-crore-of-rs-992293.html
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/22052010/21ids-pg1-0.pdf
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/22052010/21ids-pg2-0.pdf

आत्महत्या स्टोरी
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/02052010/1ids-pg3-0.pdf
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/02052010/1ids-pg4-0.pdf

विधायक की वीआइपी मुलाकात
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/29042010/28ids-pg1-0.pdf
http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/29042010/28ids-pg3-0.pdf


http://www.bhaskar.com/2010/04/23/registry-land-scam-crime-fraud-902673.html


http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/27042010/26ids-pg1-0.pdf

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/27042010/26ids-pg2-0.pdf


http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/24042010/23ids-pg1-0.pdf

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/24042010/23ids-pg2-0.pdf

http://10.51.3.8/dainikepaper/epaperpdf/24042010/23ids-pg3-0.pdf

Sunday, May 16, 2010

कोशिश करने वालो की हार नहीं होती







हर इन्सान के अन्दर एक बहुत प्यारा सा, बच्चा छिपा होता है, जीवन की व्यस्तताएं तथा जिम्मेवारियों के कारण हम उस बच्चे को हंसने से रोकते रहतें हैं . "कोई क्या कहेगा" के भय से वह बच्चा कभी सब के सम्मुख नहीं आ पाता और हम बड़प्पन का लबादा ओढे रह कर, हँसना लगभग भूल जाते हैं ! बड़प्पन की इस बेवकूफी से निकलने का प्रयास करने वाले ही सही मायनो मै जिंदगी को जीते है !
सोनू पंडित

Friday, May 14, 2010

युवा है हम


हम युवा है!
उलटा करोगे तो वायु हो जायेगा,
वायु मतलब हवा !
हवा थमकर चले तो बेहतर,
बिगड़ जाये तो सब तहस नहस कर देती है !